XposeTimesNewsDesk. रक्षा
मंत्री राजनाथ सिंह के एक बयान ने सियासी भूचाल ला दिया है, रक्षा मंत्री ने कहा
कि पं. नेहरू जनता से पैसे लेकर और सरकारी फंड को खर्च कर बाबरी मस्जिद बनाना चाहते
थे जिसपर सरदार पटेल ने आपत्ति की थी। वहीं रक्षा मंत्री ने कहा कि सरदार पटेल
द्वारा सोमनाथ मंदिर को लेकर बताया गया था कि मंदिर लोगों द्वारा दान दिये गये
पैसों से बना था। इस बयान के बाद विवाद तो खड़ा होना ही था, जैसे ही विपक्ष ने सवाल
खड़ा करने शुरु किया भाजपा की ओर से उस पुस्तक का जिक्र कर दिया गया जिसमें ये
सारे तथ्य स्वयं सरदार पटेल ने लिखे थे। रक्षा मंत्री के इस बयान से कांग्रेस
पार्टी तिलमिला उठी और विरोध करने लगी जिसके बाद नेहरू के हिन्दू विरोधी होने के
सबूत के साथ भाजपा मैदान में कूद पड़ी है जिसका जवाब देते कांग्रेस से नहीं बन रहा
है।
जिस कथन को लेकर विवाद शुरु
हुआ है वह कोई कपोल कल्पित नहीं बल्कि दी इनसाइड स्टोरी ऑफ सरदार पटेल-डायरी ऑप
मनीबेन पटेल (The Inside Story of Sardar Patel –
Diary of Maniben Patel) के पेज नंबर 24 में लिखी
गयी है गई है। पुस्तक में साफ लिखा है कि कैसे नेहरू बाबरी मस्जिद के निर्माण को
लेकर चिंतित थे। वो सरकारी पैसे का उपयोग भी करने को तैयार थे, लेकिन सरदार पटेल ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। इस दौरान सरदार पटेल ने
सोमनाथ मंदिर का उदाहरण भी दिया जो लोगों के दान के पैसों से बना था। लेकिन नेहरू
ने उसके उद्घाटन में जाने से मना कर दिया। यहाँ तक कि राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद
को भी जाने से रोका था।
नेहरू चाहते थे बाबरी मस्जिद
के पुनर्निर्माण में सरकारी पैसे लगाना- राजनाथ सिंह
गुजरात के साधली गाँव में मंगलवार
को आयोजित यूनिटी मार्च के दौरान ये दावा राजनाथ सिंह ने किया। उन्होंने कहा कि नेहरू ने कभी
अयोध्या में बाबरी मस्जिद के निर्माण के लिए सरकारी धन का उपयोग करने का प्रस्ताव
दिया था, जिसका तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने
कड़ा विरोध किया था।
इतना ही नहीं उन्होंने कहा, “जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बाबरी मस्जिद
के मुद्दे पर सरकारी खजाने से पैसा खर्च करने की बात छेड़ी थी, सरकारी खजाने के पैसे से बाबरी मस्जिद बनाई जानी चाहिए। उसका भी विरोध
सरदार पटेल ने ही किया था।”
राजनाथ सिंह के मुताबिक, सरदार पटेल का स्पष्ट मत था कि धार्मिक
स्थलों पर सरकारी धन खर्च नहीं होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि
सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में जनता के दान से जुटाए गए 30 लाख रुपए लगे थे, ना कि इसमें सरकारी पैसा लगा था।
उन्होंने कहा कि सोमनाथ
मंदिर की तरह ही अयोध्या के राम मंदिर निर्माण में भी सरकार का पैसा नहीं लगा है
और इसका पूरा खर्च जनता ने उठाया है। राजनाथ सिंह ने यह भी दावा किया है कि सरदार
पटेल के निधन के बाद उनके स्मारक के लिए जनता की जुटाई राशि को पंडित नेहरू ने
‘कुएँ और सड़क निर्माण’ में लगाने का सुझाव दिया था, जो बिल्कुल बेतुका था।
सत्य के तथ्य को झुठलाने में
जुटी विपक्षी पार्टिया
कॉन्ग्रेस ने नेहरू का नाम
लेते ही रोना गाना शुरू कर दिया है। विपक्ष भी बौखला गया। समाजवादी पार्टी के
सांसद धर्मेन्द्र यादव ने कहा कि बीजेपी ऐतिहासिक तथ्यों को कैसे पेश करती है, ये पूरा देश जानता है।
कॉन्ग्रेस सांसद इमरान
प्रतापगढ़ी ने कहा कि राजनाथ सिंह को ये जानकारी कहाँ से मिली। वे देश के रक्षा
मंत्री है। चीफ मंत्री भी रह चुके हैं। ऐतिहासिक सदर्भों में उन्हें सबूत के साथ
बात रखनी चाहिए।
वहीं कॉन्ग्रेस सांसद मनीष
तिवारी ने राजनाथ सिंह पर एतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप
लगाया। उन्होंने कहा कि रक्षा मंत्री को रणनीतिक चुनौतियों पर ध्यान देना चाहिए
पृष्ट संख्या 24 ने उजागर
किये राज
रक्षामंत्री ने जो भी तथ्य
कहे है वह सबूतों के आधार पर है, मनीबेन पटेल की पुस्तक दी इनसाइड स्टोरी ऑफ सरदार
पटेल, जिसके पेज नंबर 24 ने राजनीति एक सच उजागर कर दिया है। इस किताब में 1936 से 1950 तक के
उनके तमाम करेस्पॉन्डेंस का उल्लेख है।
पेज नंबर 24 में ये लिखा हुआ है कि नेहरू ने जब बाबरी
मस्जिद के लिए पैसे पर बात की, तो सरदार पटेल ने कहा कि
सरकार मस्जिद बनाने के लिए कोई पैसा नहीं दे सकती।
सरदार पटेल ने कहा था कि
सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार के लिए जनता से पैसे माँगे गए थे और 30 लाख रुपए जमा हुए। पटेल ने नेहरू से कहा
था कि मंदिर के पुनर्निमाण में कोई सरकारी पैसा नहीं लगा। वह एक प्राइवेट ट्रस्ट
द्वारा कराया गया है। मुंशी जी उनके सदस्य हैं और सरकारी धन का कोई उपयोग नहीं हुआ
है। इस पर नेहरू चुप हो गये। नेहरू ने बाबरी मस्जिद का विषय उठाया। सरदार पटेल ने
उसका प्रतिरोध किया और उन्होंने कहा कि सोमनाथ के पुनर्निमाण का विषय इससे अलग है।
राम मंदिर से हिन्दुओं को
‘बेदखल’ करने की नेहरू ने की थी कोशिश
जवाहरलाल नेहरू ने हिन्दुओं के
प्रति हीन भावना का एक और प्रदर्शन किया था, जब उन्होंने राम जन्मभूमि स्थल पर
मौजूद प्रतिमाओं को हटाने का आदेश दिया था। उन्होंने तत्कालीन उत्तर प्रदेश के
मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को निर्देश दिया था। हिन्दू-मुस्लिम विवाद को देखते
हुए जिला मजिस्ट्रेट कंडांगलथिल करुणाकरण नायर यानी केके नायक को सरकार
ने राम जन्मभूमि मुद्दे पर रिपोर्ट बनाने के लिए कहा था। उन्होंने अपने सहयोगी
गुरुदत्त सिंह को ये काम सौंप दिया। गुरुदत्त सिंह ने 10 अक्टूबर
1949 में राम जन्मभूमि पर राजसी राम मंदिर बनवाने की सिफारिश
की थी।
इसके बावजूद रामजन्मभूमि
साइट से मूर्तियों को हटाने का निर्देश दिया गया। इस पर तत्कालीन आईसीएस अधिकारी
और जिला मजिस्ट्रेट केके नायर ने आदेश को मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने जोर
दिया कि हिन्दू यहाँ पूजा करते हैं। मूर्तियों को यहाँ से नहीं हटाया जा सकता है।
इससे नाराज होकर कांग्रेस सरकार ने उन्हें निलंबित भी कर दिया। इसके बाद कोर्ट से
उन्हें राहत मिली लेकिन उन्होंने नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार में काम करने से
इनकार कर दिया।
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