काजल और कालिख की राजनीति
मोनेश श्रीवास्तव
भारत की राजनीति में
भाति-भाति के लोगों का पदार्पण होता रहा है लेकिन देश द्रोही, धर्म द्रोही, समाज
द्रोही भी पनपने लगे ये तो खतरे की घंटी है। ये कथन मैं किस संदर्भ में कहा रहा है
इसकी चर्चा इस लेख में कुछ आगे करूंगा, पहले बात करते है वर्ष 2014 से शुरु हुए
राजनीति के नये आयाम की.... भारत की राजनीति ने 2014 में 360 डिग्री की करवट ली थी,
70 सालों से सत्ता की कूर्सी पर चाप कर बैठे लोगों को पटखनी मिली। फिर बयार बना
शुरु हुई राष्ट्रवादी राजनीति की और जनता ने इसे सहर्ष स्वीकार किया और सत्ता बदल
दी। नरेन्द्र दामोदर दास मोदी प्रधानमंत्री बने, और उन्होंने खुद को देश का, जनता
का सेवन बना दिया, इससे पहले ऐसा शायद ही देखा गया था।
दस साल में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने दो बार सरकार
की बागडोर संभाली इस दौरन देश और देश वासियों से बढ़कर उन्होंने कुछ नहीं समझा, आज
2024 में वह देश की जनता को अपना परिवार मानकर राजनीति की नयी परिपाठी लिख रहे है।
वहीं देश की जनता भी उन्हें उसी सम्मान के साथ अपने परिवार का हिस्सा बता रही है। लेकिन
राजनीति में तो और भी दलों के दलदल बने हुए है इस दलदल में गंदगी न हो ऐसा कैसे हो
सकता है। लोकसभा का चुनाव अब सिर पर है हर राजनैतिक दल जोर आजमाइश कर रहे है और
करना भी चाहिए क्योंकि यही लोकतंत्र की गरिमा है। सही को सत्ता मिलनी चाहिए और गलत
को किनारे किया जाना चाहिए। दो बार जनता ने अपना बहुमत देकर सही को सही ठहराते हुए
सही से बहुमत देकर सही जगह बिठा दिया। लेकिन यहां सही को गलत ठहराने के लिए सभी गलत
एकजुट हो गये। कभी एक दूसरे को गाली देने वाले आज गलबहिया कर सिर्फ और सिर्फ एक
एजेंडे पर चल रहे हैं वह है नरेंद्र मोदी को हराने का, क्यों हराना है, देश में
क्या गलत हो रहा है, उनके पास अपने क्या मुद्दे है, देश को आगे बढ़ाने के लिए उनके
पास क्या विजन है इसका दूर दूर तक कुछ पता नहीं है लेकिन मोदी को हराना ही मूल
उद्देश्य है।
चलिए मान लेते है कि नरेंद्र मोदी को हराने जरूरी है, इसके लिए एक गठबंधन
बनाया गया जिसे इंडी गठबंधन नाम दिया गया इस गठबंधन के मूर्त रूप लेते ही भारत के
मूल धर्म सनातन के खात्में की बात शुरु हो गयी, नरेंद्र मोदी की औकात देखी जाने
लगी मोदी विरोध में जितना निचले स्तर पर जाकर बयानबाजी की जा सकती थी उससे भी नीचे
जाकर बयान दिये जाने लगे।
अब मैं अपनी पहली पंक्ती में कही हुई बात पर आता हूं क्योंकि कुछ बयान इस ओर
इशारा कर रहे हैं कि पार्टी और नेता का विरोध करते करते नेता देश, समाज और धर्म का
विरोध करने लगे हैं। लेकिन ऐसे में उन्हें ये गलतफहमी हो गयी है कि ये अनर्गल
बयानबाजी उन्हें जीत दिलायेंगी, इस तरह की
बात का सीधा फायदा बीजेपी और नरेंद्र मोदी को ही होना है, और तो और नरेन्द्र मोदी
की राजनीति को विरोधी पार्टियों के नेता समझ पाने में अभी असमर्थ है क्योंकि मोदी
बात करते हैं भारत को 2047 यानी आजादी के सौ वर्ष पूरे होने तक विकसित देश बनाने
की तो वहीं विरोधी बात करते हैं मोदी को सत्ता से हटाने की, मोदी दस वर्ष के
कार्यकाल में किये गये अपने कार्यों की सूची के साथ जनता दरबाज में जाते हैं तो
विरोधी मोदी को गाली देने के लिए दरबार सजाते हैं। मोदी देश की 140 करोड़ जनता को
अपना परिवार बताते हैं तो विरोधी उनके परिवार और उनकी मां पर अमर्यादित टिप्पणी
करते हैं। मोदी बात करते हैं देश को दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था की श्रेणी में
लाने की तो विरोधी बात करते है जाति वाद फैलाने की। ऐसी तमाम बिन्दू है जिसपर मोदी
भविष्य के मिशन को लेकर आगे बढ़ रहे है तो वहीं विरोधी गठबंधन अराजकता फैलाने
वालों के समर्थन में खड़े दिखते हैं।
बात होती है किसी और के प्रधानमंत्रीत्व चेहरे की तो भाजपा में करीब आधा दर्जन
चेहरे सामने आ चुके है जो देश को मजबूत सशक्त और संगठित कर रहे हैं वहीं विरोधी
खेमे में एक भी ऐसा चेहरा अपना मुंह दिखाने लायक नहीं दिखता जिसे देश की जनता
प्रधानमंत्री के तौर पर देखना या सोचना भी पसंद करें। हमारे देश की जनता खूब जानती
है कि किसे चुनना है और किसे नहीं, 2024 का चुनाव भारत की नयी उम्मीदों का सवारा
है, हम इसे अंधकार के हत्थे नहीं चढ़ने दे सकते।